—मैं कप्तान साहब के फैसले से बहोत खुश हूं, भाई

गाजीपुर। अरे घूमंतू भाई, क्या बात है, आज बहोत देर से घर से निकले है। जुम्मन भाई, कभी-कभी आप ऐसी बात करते है कि मुझे गुस्सा आता है। देख नहीं रहे हैं दो दिन से मौसम का मिजाज खराब चल रहा है। क्या यही चाहते है कि मैं इस उम्र में अपनी सेहत से रिस्क लूं। नाराज मत होइए भाई, बैठिए। एक बात हमकों समझ में नहीं आई घूमंतू भाई कि अचानक कप्तान हूजुर की त्योरी सदर कोतवाल और सुहवल एसओ के खिलाफ क्यों चढ़ गई। आप मुझसे यह सवाल कर रहे हैं जुम्मन भाई, क्या आप भूल गए कि जब आपका मामला सदर कोतवाली में फंसा था तो आपने साहब को कैसे खुश किया था। आपको उनके कारखासों से मोलभाव कर अपना काम कराना पड़ा था। याद है, घुमंतू भाई, उस दिन मेरे साथ ही वहां अन्य कई पीड़ित भी मौजूद थे, जिनसे साहब के कारखास मामला को रफा-दफा करने के लिए डील करने में जुटे हुए थे। यह देख मैं इस सोच में पड़ गया था कि आएदिन पुलिस के आला-अधिकारियों द्वारा यह फरमान जारी किया जाता है कि थाना में आने वाले पीड़ितों से मित्रवत व्यवहार करते हुए उनकी समस्याओं को हल कराया जाए, लेकिन वहां तो पुलिस किसी और तरीके से मित्रता निभाते हुए दिखाई दी। यही नहीं भाई, मुझे अंदरखाने से पता चला है कि बालू माफियाओं पर भी कोतवाली के साहब और सुहवल थानाध्यक्ष की मेहरबानी रही है। हमीद सेतु की तबियत नासाज रहने के बाद भी इन लोगों द्वारा हरी झंडी दिए जाने से धड़ल्ले से ओवरलोड बालू के ट्रैक्टर-ट्राली फर्राटा भरते रहे हैं। शायद मलाई काटने वाले इन दोनों अधिकारियों की खबर कप्तान साहब तक किसी ने पहुंचा दी, जिसको उन्होंने गंभीरता से लेते हुए दोनों लोगों को लाइन का रास्ता दिखा दिया। इससे पुलिस महकमा में हड़कंप मच गया। एक बात कहूं, घूमंतू भाई, क्या, मैं कप्तान साहब के इस फैसले से बहोत खुश हूं। उनके इस कड़क फैसले से शायद गलत काम करने वाले अन्य थानाध्यक्षों की कार्यप्रणाली में सुधार आए और वह ईमानदारीपूर्वक अपनी ड्यूटी निभाते हुए जनता में पुलिस के प्रति विश्वास कायम करें। जिले को वर्षों बाद ऐसे एसपी साहब मिले है, जिनकी सोच कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाए रखने की है। भाई यदि मेरे सूत्र की माने तो कप्तान साहब ऐसे थानाध्यक्षों और पुलिस कर्मियों कुंडली खंगाल रहे हैं, जिनकी कार्यप्रणाली ठीक नहीं है। वह अपने फायदे के लिए नियम-कानून से खिलवाड़ कर रहे हैं, ऐसे लोगो पर भी कार्यवाही की गांज गिर सकती है। बहोत देर हो गई है, जुम्मन भाई, अब मैं चलता हूं। जाते-जाते बस इतना कहूंगा कि शायद सदर कोतवाली और सुहवल के साहब ईमानदारी के फेवर में नहीं थे, इसलिए उन पर गांज गिरी।