प्राथमिक पाठशाला के दायरे में शिक्षा के विस्तार की जरूरत

 

प्रतापगढ़।समय ऐसा आ गया है कि दूरियां ही दवा बन गई है। स्कूल कालेज बंद है ऐसे में परिवार को बच्चे की पहली पाठशाला में ही रहने की विवशता है, यह हालातो की उपज का परिणाम है नही तो नौनिहालों को कुलांचे मारते,हंसते खिलखिलाते और मटरगस्ती करते हुए ही देखते लेकिन जैसे सब हालातो ने ये सब खुशियां उनकी मुट्ठी से छीन लिया। मासूम बच्चा कोरोना की गंभीरता लोगो की बातों को सुनकर समझता है लेकिन उसका मतवालापन और उत्साह उसे सहज बना देता है लेकिन अगले पल किसी अनहोनी की खबर सुनकर वह भी स्तब्ध रह जाता है। बच्चा है लेकिन उसके भीतर भी एक डर है पता नही यह डर कब जाएगा कोरोना के जाने के बाद कब तक किसी के जेहन में रहेगा यह महत्वपूर्ण है लेकिन अब परिवार को बड़ी पाठशाला में तब्दील करने की चुनौती है। बेशक के अभिभावक उच्च शिक्षा से महरूम है तो भला बच्चो को कैसे पढ़ाएंगे तो साहब इंटरनेट और यूट्यूब का जमाना है मतलब अब कोई बहाना नही है अगर सीखने सिखाने का इरादा है तो संसाधन घर मे है । शिक्षाशास्त्र और समाजशास्त्र में हमेशा यही पढ़ाया जाता रहा है कि परिवार बच्चे की प्रथम पाठशाला है लेकिन उसे हकीकत में तब्दील कर उसकी सार्थकता तय करने उच्च शिक्षा में बदलने की जिम्मेदारी अब हर माता पिता की बनती जा रही है।